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बिग ब्रेकिंग: शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती का निधन, अंतिम सांस ली

Big Breaking: Shankaracharya Swaroopanand Saraswati passed away, breathed his last

11 September 2022

/ by Uday Bharat

 

TNP DESK : द्वारका एवं शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का रविवार को निधन हो गया. वे 99 साल के थे. उन्होंने मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर में आखिरी सांस ली. स्वरूपानंद सरस्वती को हिंदुओं का सबसे बड़ा धर्मगुरु माना जाता था.

हिंदुओं को संगठित करने की भावना से आदिगुरु भगवान शंकराचार्य ने 1300 वर्ष पूर्व भारत के चारों दिशाओं में चार धार्मिक राजधानियां (गोवर्धन मठ, श्रृंगेरी मठ, द्वारका मठ एवं ज्योतिर्मठ) बनाईं. जगद्गुरु शंकराचार्य श्री स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी दो मठों (द्वारका एवं ज्योतिर्मठ) के शंकराचार्य थें.

शंकराचार्य का पद हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण है, हिंदुओं का मार्गदर्शन और भगवत् प्राप्ति के साधन आदि विषयों में हिंदुओं को आदेश देने के विशेष अधिकार शंकराचार्यों को प्राप्त होते हैं. सभी हिंदूओं को शंकराचार्यों के आदेशों का पालन करना चाहिए. वर्तमान युग में अंग्रेजों की कूटनीति के कारण धर्म का क्षय, जो कि हमारी शिक्षा पद्धति के दूषित होने और गुरुकुल परंपरा के नष्ट होने से हुआ था.

हिंदूओं को संगठित कर पुनः धर्मोत्थान के लिए चारों मठों के शंकराचार्य और सभी वैष्णवाचार्य महाभाग सक्रिय थें. स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती जी, सांई बाबा की पूजा करने के विरोध में थे क्योंकि कुछ हिंदू दिशाहीन हो कर अज्ञानवश असत् की पूजा करने में लगे हुए थें, जिससे हिंदुत्व में विकृति पैदा हो रही है. स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के अनुसार इस्कॉन भारत में आकर कृष्ण भक्ति की आड़ में धर्म परिवर्तन कर रहा है, ये अंग्रेजों की कूटनीति है कि हिंदुओं का ज्ञान ले कर हिंदुओं को ही दीक्षा दे कर अपना शिष्य बना रहे हैं.

स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का परिवार
स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी का 95 वां जन्मदिवस वृंदावन में वर्ष 2018 में मनाया गया और यहीं उनका 72वां चातुर्मास समपन्न हुआ. स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जन्म 2 सितम्बर 1924 को मध्य प्रदेश राज्य के सिवनी जिले में जबलपुर के पास दिघोरी गांव में ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम धनपति उपाध्याय और मां का नाम श्गिरिजा देवी थी. माता-पिता ने इनका नाम पोथीराम उपाध्याय रखा. नौ वर्ष की उम्र में उन्होंने घर छोड़ कर धर्म यात्रायें प्रारम्भ कर दी थीं. इस दौरान वह काशी पहुंचे और यहां उन्होंने ब्रह्मलीन श्री स्वामी करपात्री महाराज वेद-वेदांग, शास्त्रों की शिक्षा ली.

स्वतंत्रता संग्राम में भी लिया था हिस्सा
यह वह समय था जब भारत को अंग्रेजों से मुक्त करवाने की लड़ाई चल रही थी. जब 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा लगा तो वह भी स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और 19 साल की उम्र में वह 'क्रांतिकारी साधु' के रूप में प्रसिद्ध हुए. इसी दौरान उन्होंने वाराणसी की जेल में नौ और मध्यप्रदेश की जेल में छह महीने की सजा भी काटी. वे करपात्री महाराज की राजनीतिक दल राम राज्य परिषद के अध्यक्ष भी थे. 1950 में वे दंडी संन्यासी बनाये गए और 1981 में शंकराचार्य की उपाधि मिली.

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